बरसों पहले एंटी-इस्टैब्लिशमेंट कहे जाने वाले एक वरिष्ठ कार्यकर्ता से एक टीवी जर्नलिस्ट को पूछते पाया, ‘इस देश की व्यवस्था से आपकी शिकायतों की सूची काफी लंबी है, लेकिन यह बताइए कि अगर आप मौजूदा सरकारी तंत्र में कोई एक बदलाव कर सकते होते तो वह क्या होता?’ उनका संक्षिप्त उत्तर था, ‘उसे संवेदनशील बनाता।‘
संवेदनहीनता सरकारी तंत्र ही नहीं, आज के समाज की, आज के मनुष्य की एक ऐसी विशेषता बनी हुई है, जो हमारी अनेकानेक समस्याओं की जड़ में है। इस लिहाज से, वह टीवी इंटरव्यू मुझे झकझोर गया था। ऐसा लगा किसी ने तमाम समस्याओं के हल की ओर इशारा कर दिया।
लेकिन नोबेल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी ने हाल में एक किताब लिखी है ‘करुणा – समाधान की शक्ति’ जिसमें वह दुनिया में बदलाव लाने वाली सबसे अहम शक्ति के रूप में करुणा का जिक्र करते हैं। किताब में सत्यार्थी करुणा क्या है, बताने से पहले यह बताते हैं कि करुणा क्या नहीं है। और वह स्पष्ट शब्दों में कहते हैं कि करुणा दया नहीं है, सहानुभूति नहीं है और संवेदनशीलता नहीं है। जाहिर है, वह करुणा को संवेदनशीलता से ज्यादा गहरा, ज्यादा उदार, ज्यादा प्रभावी भाव मानते हैं।
शुक्रवार को नोएडा स्थित एमिटी यूनिवर्सिटी में इस पुस्तक के विमोचन के मौके पर राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश समेत तमाम वक्ताओं ने करुणा के विभिन्न पहलुओं का जिक्र किया। लेकिन जाने माने आलोचक, कवि, चिंतक पुरुषोत्तम अग्रवाल इस मायने में खास रहे कि उन्होंने करुणा की सीमाओं को रेखांकित किया। बहस को वर्तमान संदर्भ देते हुए उन्होंने दिल्ली के सत्यनिकेतन में पिछले दिनों इमारत गिरने की घटना से इसे जोड़ा।
उनका कहना था कि इमारत गिरने पर उससे प्रभावित लोगों और परिवारों के प्रति करुणा से मैं अभिभूत हो सकता हूं, उनकी हर संभव मदद भी करता हूं। लेकिन अगर वह बिल्डिंग अवैध रूप से बनी और अपनी जगह पर बरसों खड़ी जर्जर होती रही, व्यवस्था के किसी भी हिस्से ने उस ओर ध्यान नहीं दिया, समय रहते आवश्यक कार्रवाई नहीं की तो मैं क्या करूं? मेरी करुणा मुझे उन सवालों तक पहुंचने, उन्हें उठाने को मजबूर नहीं करती तो ऐसी करुणा का क्या मतलब?
कैलाश सत्यार्थी इस पर लंबे समय से सोचते रहे हैं। सो निश्चित रूप से करुणा के दायरे को उन्होंने इतना सीमित नहीं रहने दिया। इसे दया और संवेदनशीलता जैसी भावनाओं से अलग करके देखने का यही मतलब है। लेकिन फिर भी करुणा में एकजुटता का भाव शायद अपने आप नहीं आता।
मिसाल के तौर पर हमारी गाड़ी किसी सिगनल पर रुकती है तो हम वहां बेचारगी की स्थिति में भीख मांगते किसी बच्चे को देखकर द्रवित हो सकते हैं। करुणा में डूब सकते हैं। पर्स निकाल कर दस-बीस ही नहीं, सौ-पचास का नोट भी उसकी कटोरी में डाल सकते हैं। लेकिन इससे ज्यादा करने की जरूरत शायद महसूस न करें, बशर्ते सिगनल ग्रीन होने और वहां से गाड़ी आगे बढ़ाने के बाद अचानक यह ध्यान न आ जाए कि उस बच्चे का चेहरा तो गांव में रहने वाले एक करीबी मित्र के बेटे से मिलता है।
उस स्थिति में हम वहां से निकल नहीं पाते, बल्कि आगे जाकर गाड़ी साइड में खड़ी कर देते हैं। लौट कर उस बच्चे को गौर से देखते हैं, उसके चेहरे के भय को समझते हैं, उसे इशारों में बताते हैं कि वह घबराए नहीं, मदद पहुंच रही है और फिर पुलिस बुलाकर या किसी भी अन्य उपाय से उसे भीख मंगवाने वाली गैंग के चंगुल से निकालने की कोशिश करते हैं।
यह तब होता है, जब करुणा केवल करुणा नहीं रहती, उसमें संबंधित व्यक्ति से ऐक्य का भाव, अभिन्नता का भाव भी जुड़ता है। तो क्या यह ऐक्य भाव करुणा से अलग, उससे स्वतंत्र कोई भाव है या उसी का विस्तार? जवाब तो बाद में मिलेगा, पर उसकी तलाश की जरूरत भी हम तभी महसूस करेंगे जब हमारे अंदर संवेदनशीलता की धारा फूटेगी।
(रेखाचित्र : प्रतीकात्मक, एआई की मदद से)
(प्रणव प्रियदर्शी ‘जनसत्ता’, ‘लोकमत समाचार’ और ‘नवभारत टाइम्स’ में लंबी पत्रकारीय पारी के बाद फ़िलहाल स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं।)